मेरा क्या है, मै तो ज़िन्दगी का दीवाना हूँ,
एक रात महल में, अगली रात सड़क पे होता हूँ।
ख्यालों में खोया एक पेड़ के नीचे,
दूर कहीं किसी मंदिर के पीछे,
अपनी मंज़िल पा जाता हूँ,
मेरा क्या है, ओ राही, मै तो ज़िन्दगी का दीवाना हूँ,
खाने को बैठु तो छप्पन भोग खा जाता हूँ,
और कभी बस एक सेब लेके, मीलो दूर निकल जाता हूँ।
गंतव्य पे पहुँच के कहता हूँ, ‘मज़ा आया, अब कही और चलता हूँ ,’
राह पे चलते-चलते फिर, कहीं और ही पहुँच जाता हूँ ।
मेरा क्या है, मै तो ज़िन्दगी का दीवाना हूँ ।
एक सुन्दर से चेहरे को देख, उसे मन में बसा लेता हूँ ,
उसके बाद कितने ही खूबसूरत चेहरे हो,
दिल में जगह नहीं दे पाता हूँ ।
मेरा क्या है मै तो ज़िन्दगी का दीवाना हूँ ।
सुबह शिव को पूजता हूँ, दोपहर में यीशु मसीह,
और शाम में कहता हूँ, ‘मै धार्मिक नहीं’।
क्या कहु इस ज़िन्दगी का, कितनी है ये रंगीन,
एक राही भी है मेरे साथ, कभी-कभी खलती है उसकी कमी।
पर छोड़ो,
मेरा क्या है, मै तो ज़िन्दगी का दीवाना हूँ ।
जीऊंगा मै आज भी, जिउंगा मै कल भी।
विश्वास है मुझे अपनी आस्था पर,
जानता हूँ होगा सब कुछ सही ।
और इस एक विश्वास के साथ,
चल दूंगा मै कही भी ।
क्यूंकि मेरा क्या है,
मै तो ज़िन्दगी का दीवाना हूँ,
राह पे चलता जाता हूँ, मंज़िल हो कही भी।
- सूर्यांश राय।
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