थोड़ा सुधरा हूं, थोड़ा बिगड़ा हूं,
पर अपने दुखों पर रोना कम कर चुका हूं।
मजबूती को जरूरत समझने लग गया हूं,
खुशी का मुखौटा भी पहनना सीख चुका हूं।
गम का मज़ाक उड़ाने लग गया हूं।
अरे कविताएं लिखने लग गया हूं!
दूसरो को मुस्कुराता देख खुश होने लग गया हूं।
हां कुछ ठोकर तो खाया था मैं,
पर जिंदगी शुरू होते ही लड़खड़ा नही सकता,
तो थोड़ा मोड़ा संभलना भी सीख गया हूं।
अभी तो बहुत कुछ देखना सीखना समझना हैं,
आशाएं रखने लग गया हूं।
दुआएं मांगने लग गया हूं।
बस यही सब करने लग गया हूं।